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समझौता या अंतरात्मा?अन्याय से ‘समायोजन’ की भारी कीमत

The Cult of Adjustment: How Silence Is Sold as Intelligence
The Cult of Adjustment: How Silence Is Sold as Intelligence

आज हमारी रोज़मर्रा की भाषा में एक शब्द बहुत चुपचाप “गुण” बन गया है — समायोजन (Adjustment)अन्याय से समायोजनशोषण से समायोजनचुप्पी से समायोजनक्योंकि सवाल उठाना असुविधाजनक है। हमें बार-बार समझाया जाता है कि:

  • समायोजन परिपक्वता है

  • समझौता बुद्धिमानी है

  • विरोध करना मूर्खता।

संदेश साफ है — जो सवाल करता है, वह समस्या है; जो समायोजन करता है, वही समझदार है।

लेकिन यही सबसे खतरनाक बौद्धिक धोखा है।

समायोजन व्यक्ति को थोड़े समय तक ज़िंदा रख सकता है, लेकिन समाज को धीरे-धीरे घुटन में डाल देता है।इतिहास उन लोगों ने नहीं बदला जिन्होंने गलत के साथ समझौता किया — इतिहास उन्होंने बदला जिन्होंने इनकार किया।

यह समझना ज़रूरी है कि:धैर्य और आत्मसमर्पण में, लचीलापन और गुलामी में, बुद्धिमानी और डर में अंतर होता है।

वह शिक्षा जो हमें कभी नहीं मिली

हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें यह नहीं सिखाती कि अन्याय कैसे सामान्य बनता है।वह न ढोल के साथ आता है, न घोषणा के साथ।वह आता है “व्यावहारिक सलाह,” “नौकरी की चिंता,” और “परिवार की जिम्मेदारी” बनकर।

हमें कहा जाता है:

  • “सिस्टम ऐसा ही है”

  • “कुछ नहीं बदलेगा”

  • “बेकार में रिस्क क्यों लेना?”

धीरे-धीरे समायोजन आदत बन जाता है —एक सुरक्षित, सम्मानित और समाज द्वारा सराही गई आदत।

और जो समायोजन से इंकार करते हैं?उन्हें जिद्दी, भावुक और अव्यावहारिक कहा जाता है।

‘समझदार लोगों’ पर एक हल्का व्यंग्य

दिलचस्प बात यह है कि सबसे “समझदार” लोग वही होते हैं जो समायोजन की सलाह देते हैं — लेकिन खुद के लिए नहीं।वे इतिहास की किताबों में क्रांतिकारियों की तारीफ करते हैं, भाषणों में साहस की बात करते हैं, सोशल मीडिया पर मोटिवेशनल कोट्स साझा करते हैं — और असल ज़िंदगी में चुप रहने की सलाह देते हैं।

उनका सिद्धांत सरल है:

“कोई और लड़ेगा। हम तो समझदार हैं, हम समायोजन करेंगे।”

इस तरह की समझदारी ने कभी न्यायपूर्ण समाज नहीं बनाया।इसने केवल आँखें फेर लेने की कला को परिपूर्ण किया है।

समायोजन बनाम आत्मसम्मान

समायोजन तब तक ठीक है, जब परिस्थितियाँ तटस्थ हों।लेकिन जब परिस्थितियाँ अन्यायपूर्ण हों, तब समायोजन अनैतिक हो जाता है।

जब समायोजन आत्मसम्मान की कीमत पर हो, तब वह बुद्धिमानी नहीं, बल्कि भागीदारी बन जाता है।

आज जो भी अधिकार हमें मिले हैं — श्रम अधिकार हों या नागरिक स्वतंत्रताएँ — वे इसलिए मिले क्योंकि किसी ने समायोजन से इंकार किया।

युवा मन के लिए संदेश

  • सवाल उठाना विद्रोह नहीं है।

  • न्याय माँगना अहंकार नहीं है।

  • शोषण से इनकार करना मूर्खता नहीं है।

  • सच्ची बुद्धिमानी चुपचाप जीवित रहने में नहीं, बल्कि सम्मान के साथ जीने के साहस में है।

समाज तब आगे बढ़ता है जब सब समायोजन नहीं करते — बल्कि कुछ लोग मना कर देते हैं।

लेखक परिचय

पंकज सोनी एक सक्रिय ट्रेड यूनियनिस्ट हैं, जो श्रमिकों का प्रतिनिधित्व विभिन्न प्रशासनिक एवं वैधानिक प्राधिकरणों के समक्ष करते हैं। उनका कार्य श्रमिक अधिकारों, आत्मसम्मान और अन्याय के सामान्यीकरण को चुनौती देने पर केंद्रित है।

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